Verse Of The Day

Verse Of The Day -    क्रूस का संदेश : पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौपता हूं ( लुका 23:46 ) ## यीशु जो हमारे उधारकर्ता की तरह से पृथ्वी पर आया, उसने अपने आत्मा और प्राण परमेश्वर के हाथों में क्यों क्यों सौपे ?     मनुष्य आत्मा, प्राण और देह से बना है ! जब वह मर जाता है तो उसकी आत्मा और प्राण देंह को छोड़ देता है ! यदि वह परमेश्वर का सत्य संतान है तो उसकी आत्मा और प्राण परमेश्वर के पास जाते हैं, अन्यथा, उसकी आत्मा और प्राण नरक में जाते हैं ( लुका 16:19-31 ) ! उसकी देह दफनाई जाती है और मिट्टी में मिल जाती है !     परमेश्वर का पुत्र यीशु देहधारी हुआ और इस संसार में आया !हमारे समान उस में आत्मा, प्राण और देह थे ! जब वह क्रूस पर लटकाया गया तो उसकी देह मर गई आत्मा और प्राण नहीं; उसने  अपनी आत्मा और प्राण परमेश्वर के हाथों में सौंप दिए !      जब आप मरते हैं तो परमेश्वर आपकी आत्मा और प्राण दोनों को ग्रहण करता है ! यदि परमेश्वर केवल आत्मा को ग्रहण करता, प्राण को नहीं तो आप स्वर्ग में सच्ची प्रसंता को कभी अनुभव नहीं कर सकते अथवा हृदय की गहराई से कभी आभारी नहीं हो सकते ! क्यों ? क्योंकि आप इन बातों को याद नहीं कर सकेंगे जो आपकी प्राण से निकलती है, जैसे आंसू, दु:ख, पीड़ा तथा अन्य बाते जो आपने पृथ्वी पर अपने सही ! इसलिए परमेश्वर आत्मा और प्राण दोनों को ग्रहण करता है !       तब यीशु ने अपनी आत्मा और प्राण परमेश्वर को क्यों सोपें ?यह इसलिए की परमेश्वर सृष्टि करता है, जो ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु को संचालित करता है और आपके जीवन, मृत्यु, शाप तथा आशीषों का ध्यान रखता है कहना यह है कि प्रत्येक वस्तु परमेश्वर की है और उसकी प्रभुता में है ! केवल परमेश्वर ही है जो आपकी प्रार्थना का उत्तर देता है ! इसलिए यीशु को अपनी आत्मा तथा प्राण को सौपने के लिए पिता परमेश्वर से विनती करनी पड़ी ( मति 10:29-31 ) ! आमीन ---        "हे परमेश्वर के पवित्र जन परमेश्वर की ओर हमारे प्रभु यीशु की पहचान के द्वारा अनुग्रह और शांति तुम में बहुतायत से बढ़ती जाए !आमीन 

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Matthew 6:33-34 King James Version (KJV)


33 But seek ye first the kingdom of God, and his righteousness; and all these things shall be added unto you.34 Take therefore no thought for the morrow: for the morrow shall take thought for the things of itself. Sufficient unto the day is the evil thereof.

                           




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20 And God spake all these words, saying,
I am the Lord thy God, which have brought thee out of the land of Egypt, out of the house of bondage.
Thou shalt have no other gods before me.
Thou shalt not make unto thee any graven image, or any likeness of any thing that is in heaven above, or that is in the earth beneath, or that is in the water under the earth.
Thou shalt not bow down thyself to them, nor serve them: for I the Lord thy God am a jealous God, visiting the iniquity of the fathers upon the children unto the third and fourth generation of them that hate me;
And shewing mercy unto thousands of them that love me, and keep my commandments.
Thou shalt not take the name of the Lord thy God in vain; for the Lordwill not hold him guiltless that taketh his name in vain.
Remember the sabbath day, to keep it holy.
Six days shalt thou labour, and do all thy work:
10 But the seventh day is the sabbath of the Lord thy God: in it thou shalt not do any work, thou, nor thy son, nor thy daughter, thy manservant, nor thy maidservant, nor thy cattle, nor thy stranger that is within thy gates:
11 For in six days the Lord made heaven and earth, the sea, and all that in them is, and rested the seventh day: wherefore the Lord blessed the sabbath day, and hallowed it.
12 Honour thy father and thy mother: that thy days may be long upon the land which the Lord thy God giveth thee.
13 Thou shalt not kill.
14 Thou shalt not commit adultery.
15 Thou shalt not steal.
16 Thou shalt not bear false witness against thy neighbour.
17 Thou shalt not covet thy neighbour's house, thou shalt not covet thy neighbour's wife, nor his manservant, nor his maidservant, nor his ox, nor his ass, nor any thing that is thy neighbour's.
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